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श्री ५ मन्दिर समिति, गंगोत्री धाम, हिमालय प्रबंधन समिति

प० श्री धर्मानंद सेमवाल ( अध्यक्ष ) 7819038047
प० श्री सुरेश सेमवाल (सचिव ) 9411184338
प० श्री सुशील सेमवाल ( कोषाध्यक्ष ) 9411553772
प० श्री अरुण सेमवाल ( उपाध्यक्ष ) 7817083529
प० श्री जयकृष्ण सेमवाल (सह-सचिव) +91 9760485475
प० श्री अभिषेक सेमवाल (कोषाध्यक्ष )+91 7895765953
प० श्री चंडी प्रसाद सेमवाल (संयोजक) +91 9411370084
प० श्री सतीश सेमवाल (सदस्य) +91 6396995047
प० श्री प्रदीप सेमवाल (सोना मंत्री) +91 9410755504
प० श्री सुनील सेमवाल (चांदी मंत्र) +91 7217331434
प० श्री संतोष सेमवाल (खाद्य मंत्री )+91 6398642689
श्री प्रेम प्रकाश सेमवाल (सदस्य +91 9410178728
हिमालय की श्वेत-शुभ्र चोटियों के मध्य, देवदार और भोजपत्र के वनों से आच्छादित, भागीरथी नदी के तट पर स्थित श्री गंगोत्री धाम न केवल चारधाम यात्रा का प्रथम पड़ाव है, बल्कि यह भारतीय आध्यात्मिक चेतना का वह केन्द्र है जहाँ स्वर्ग और पृथ्वी के मिलन की कथा जीवित हो उठती है। यही वह पावन स्थल है जहाँ माँ गंगा ने पहली बार धरती को स्पर्श किया—मानव कल्याण के लिए।
गंगोत्री धाम उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जनपद में लगभग 3,100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ बहने वाली भागीरथी नदी ही आगे चलकर देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर गंगा कहलाती है। समीप ही स्थित गंगोत्री हिमनद (गौमुख) को गंगा का भौतिक उद्गम माना जाता है, जबकि गंगोत्री को उसका आध्यात्मिक उद्गम स्थल कहा जाता है।

गंगोत्री का पौराणिक इतिहास भागीरथ की तपस्या और गंगा अवतरण

भारतीय धर्मग्रंथों में गंगोत्री का इतिहास राजा भागीरथ की महान तपस्या से जुड़ा है। रामायण, महाभारत और पुराणों के अनुसार, राजा सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनके उद्धार हेतु भागीरथ ने वर्षों तक कठोर तप किया, जिससे प्रसन्न होकर माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित होने को तैयार हुईं।
किन्तु गंगा के प्रचंड वेग से पृथ्वी के विनाश की आशंका थी। तब भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर उनके वेग को नियंत्रित किया और धीरे-धीरे धरती पर प्रवाहित किया। यही दिव्य अवतरण गंगोत्री क्षेत्र में माना जाता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण (9.9) में वर्णन आता है कि गंगा शिव की जटाओं से मुक्त होकर लोक-कल्याण हेतु प्रवाहित हुईं।
जटाजूटात् समुत्पन्ना गङ्गा त्रैलोक्यपावनी।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)
अर्थात—जटाओं से उत्पन्न गंगा तीनों लोकों को पवित्र करने वाली हैं।

गंगोत्री मंदिर का इतिहास और स्थापत्य

वर्तमान गंगोत्री मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा द्वारा कराया गया। मंदिर श्वेत ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है और उत्तर भारतीय नागर शैली की सरल किन्तु भव्य वास्तुकला का उदाहरण है। गर्भगृह में माँ गंगा की दिव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है।

मंदिर की पूजा-अर्चना की परंपरा सदियों से मुखबा गाँव के सेमवाल ब्राह्मणों द्वारा निभाई जाती रही है। शीतकाल में भारी हिमपात के कारण माँ गंगा की प्रतिमा को मुखबा गाँव में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जहाँ शीतकालीन पूजा निरंतर चलती रहती है।

धार्मिक महत्व मोक्षदायिनी माँ गंगा

हिंदू धर्म में गंगा को पापनाशिनी, मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी कहा गया है। यह विश्वास है कि गंगा के दर्शन, स्पर्श और स्नान मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
📿 गंगा स्तुति (स्कंद पुराण काशी खंड)
गंगे यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
(स्कंद पुराण)
यह श्लोक आज भी गंगा स्नान के समय संपूर्ण भारत में उच्चारित किया जाता है।
परंपराएँ और धार्मिक अनुष्ठान
प्रति वर्ष अक्षय तृतीया के शुभ दिन गंगोत्री धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। यह क्षण अत्यंत दिव्य और भावपूर्ण होता है। पूरे वैदिक मंत्रोच्चार, ढोल-नगाड़ों और भक्ति संगीत के साथ माँ गंगा का आह्वान किया जाता है इसमें प्रातःकालीन अभिषेक, गंगा अर्चना, सायंकालीन आरती, गंगा दशहरा, कार्तिक पूर्णिमा जैसे विशेष पर्व श्रद्धा और विधि-विधान के साथ संपन्न होते हैं।
गंगोत्री केवल तीर्थ नहीं, चेतना का केन्द्र
गंगोत्री धाम केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यह स्थल हमें त्याग, तप, करुणा और प्रकृति-संरक्षण का संदेश देता है। माँ गंगा का अवतरण यह स्मरण कराता है कि जब मानव कल्याण सर्वोपरि हो, तब देवत्व भी धरती पर उतर आता है।
श्री गंगोत्री धाम हिमालय की गोद में स्थित वह दिव्य धरोहर है जहाँ भूगोल, इतिहास, धर्म और आध्यात्मिकता एकाकार हो जाते हैं। यह स्थान भारत की सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक है—जहाँ माँ गंगा आज भी अपने निर्मल प्रवाह से मानवता को शुद्ध और पावन करती हैं।