श्री ५ मन्दिर समिति, गंगोत्री धाम, हिमालय प्रबंधन समिति
हिमालय की श्वेत-शुभ्र चोटियों के मध्य, देवदार और भोजपत्र के वनों से आच्छादित, भागीरथी नदी के तट पर स्थित श्री गंगोत्री धाम न केवल चारधाम यात्रा का प्रथम पड़ाव है, बल्कि यह भारतीय आध्यात्मिक चेतना का वह केन्द्र है जहाँ स्वर्ग और पृथ्वी के मिलन की कथा जीवित हो उठती है। यही वह पावन स्थल है जहाँ माँ गंगा ने पहली बार धरती को स्पर्श किया—मानव कल्याण के लिए।
गंगोत्री धाम उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जनपद में लगभग 3,100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ बहने वाली भागीरथी नदी ही आगे चलकर देवप्रयाग में अलकनंदा से मिलकर गंगा कहलाती है। समीप ही स्थित गंगोत्री हिमनद (गौमुख) को गंगा का भौतिक उद्गम माना जाता है, जबकि गंगोत्री को उसका आध्यात्मिक उद्गम स्थल कहा जाता है।
गंगोत्री का पौराणिक इतिहास — भागीरथ की तपस्या और गंगा अवतरण
भारतीय धर्मग्रंथों में गंगोत्री का इतिहास राजा भागीरथ की महान तपस्या से जुड़ा है। रामायण, महाभारत और पुराणों के अनुसार, राजा सगर के साठ हजार पुत्र कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनके उद्धार हेतु भागीरथ ने वर्षों तक कठोर तप किया, जिससे प्रसन्न होकर माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित होने को तैयार हुईं।
किन्तु गंगा के प्रचंड वेग से पृथ्वी के विनाश की आशंका थी। तब भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर उनके वेग को नियंत्रित किया और धीरे-धीरे धरती पर प्रवाहित किया। यही दिव्य अवतरण गंगोत्री क्षेत्र में माना जाता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण (9.9) में वर्णन आता है कि गंगा शिव की जटाओं से मुक्त होकर लोक-कल्याण हेतु प्रवाहित हुईं।
जटाजूटात् समुत्पन्ना गङ्गा त्रैलोक्यपावनी।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)
अर्थात—जटाओं से उत्पन्न गंगा तीनों लोकों को पवित्र करने वाली हैं।
गंगोत्री मंदिर का इतिहास और स्थापत्य
वर्तमान गंगोत्री मंदिर का निर्माण 18वीं शताब्दी में गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा द्वारा कराया गया। मंदिर श्वेत ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है और उत्तर भारतीय नागर शैली की सरल किन्तु भव्य वास्तुकला का उदाहरण है। गर्भगृह में माँ गंगा की दिव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है।
मंदिर की पूजा-अर्चना की परंपरा सदियों से मुखबा गाँव के सेमवाल ब्राह्मणों द्वारा निभाई जाती रही है। शीतकाल में भारी हिमपात के कारण माँ गंगा की प्रतिमा को मुखबा गाँव में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जहाँ शीतकालीन पूजा निरंतर चलती रहती है।
धार्मिक महत्व — मोक्षदायिनी माँ गंगा